मैं. मैं और मैं (कहानी) हम एकांत में रहते हैं. एकांत अच्छा लगता है. एकांत मुक्त करता है. एकांत एकाग्र होने में मदद करता है. अगर आपको समय का सकारात्मक और सृजनात्मक सदुपयोग करना है तो एकांत को चुनो. एकांत को अपनाओ. एकांत को जीओ, एकांत को पीओ, एकांत को खाओ, एकांत को ओढ़ो, एकांत को पहनो और फिर देखो एकांत आनंद. अरे आप तो ये पढ़ कर घबरा ही गए कि आज किस पागल लेखक से पाला पड़ा है जो एकांत को खाने, पीने, ओढ़ने, पहनने की कह रहा है. एकांत भी कोई खाने, पीने और ओढ़ने पहनने की चीज है? आपने ठीक कहा हमारे प्रिय प्रबुद्ध पाठक. एकांत में जीने, खाने, पीने और ओढ़ने का अर्थ है एकांत में ही खो जाओ. उसी में डूब जाओ जिससे किसी पुरुष को आभास न रहे कि कोई कमला, विमला, निर्मला भी है और स्त्री को आभास न रहे कि कोई मोहन, सोहन और त्रिलोचन भी है. मगर एकांत के विपरीत अकेलापान काटता है. आजकल हम अकेलापन अनुभव कर रहे हैं. अकेलापन क्यों अनुभव कर रहे हैं? क्योंकि आजकल हम सिर्फ मैं, मैं, मैं, मैं, मैं, मैं, मैं, मैं, मैं, मैं, मैं, मैं, मैं, मैं, मैं, मैं ही सुनते रहते हैं. अब आप ही बताएं कि जब मैं, मैं, मैं, म...
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#सेंगोल_विवाद ने द हिन्दू की अध्यक्ष मालिनी पार्थसारथी की कुर्सी की बलि ले ली, उन्हें अखबार के मुखिया पद से इस्तीफा देना पड़ा है! मालिनी की रस्साकस्सी द हिन्दू के अन्य बोर्ड मेंबर्स के साथ चल रही थी. मालिनी मोदी और भाजपा के सुर में सुर मिला रही थी जबकि बोर्ड के अन्य सदस्य मोदी समूह द्वारा उडाई जा रही झूठी अफवाहों का खंडन कर रहे थे. मोदी समूह और मालिनी की सरकारी घोषणा जो कहती है कि सेंगोल को #माउंटबेटन ने देश के पहले प्रधानमंत्री श्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को सत्ता स्थानांतरण के प्रतीक के तौर पर दिलवाया था, एक दम झूठ है! हिन्दू के एक पत्रकार ने तथ्यों के साथ ये सिद्ध कर दिया था कि ये झूठे दावे हैं. दिग्गज पत्रकार और हिन्दू के पुराने अध्यक्ष एन. राम ने बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस करके 29 अगस्त 1947 के हिन्दू का वो संस्करण लोगों के सामने रख दिया था जिसमें सेंगोल को नेहरू को सौंपते समय की ख़बर प्रकाशित थी! इस पूरी खबर में कहीं भी माउंटबेटेन वाली कहानी का कोई जिक्र नही है और न ही #राजगोपलाचारी जी का कोई बयान! एन. राम के अनुसार कुल मिला कर सेंगोल एक निजी मठ की तरफ से नये बने प्रधानमंत्...
मधुर स्मृतियाँ (कहानी) अचानक शशांक की नजर अपने शयन कक्ष की खिड़की पर जा टिकी थी. खिड़की में से अंदर झांकते हुए उसने जो देखा था, उस पर वह सकपकाया था और फिर मुस्करा दिया था. उसने देखा था कि विमला चैन से सो रही थी. विमला उसकी पत्नि थी. उसने देखा कि वह पसीने से लथपथ है मगर फिर भी गर्मी से एक दम बेखबर है. भयंकर गर्मी के बावजूद वह चैन से सो रही है. यह देख कर शशांक एक बार फिर से मुस्करा दिया था. शशांक फिर से क्यों मुस्कराया था? कहा न कि विमला पसीने से तरबतर थी. फिर भी गहरी नींद में डूब उतर रही थी. दोबारा मुस्कराने का कारण भी वही था. उसके बाद शशांक पुरानी यादों में खो गया था और अपनी उस बेचैनी को भूल गया था जिसने उसे कई घंटों से बेचैन कर रखा था. शशांक को अच्छी तरह से ज्ञात था कि अगर ढ़ोल नगाड़े भी बजते रहें तो भी उसकी प्रिय पत्नि को कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला. शशांक का अपनी प्रिय पत्नि की गहरी नींद से वास्ता पहली रात जिसे लोग मधुमास या सुहागरात कहते हैं, को ही पड़ गया था. जब वह अपने शयन कक्ष में गया तो वह घोड़े बेच कर सो रही थी. यह देख कर उसे बहुत अचरज हुआ था. जिस रात की नवयुग्ल बेसब्री और ...
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