मैं. मैं और मैं (कहानी) हम एकांत में रहते हैं. एकांत अच्छा लगता है. एकांत मुक्त करता है. एकांत एकाग्र होने में मदद करता है. अगर आपको समय का सकारात्मक और सृजनात्मक सदुपयोग करना है तो एकांत को चुनो. एकांत को अपनाओ. एकांत को जीओ, एकांत को पीओ, एकांत को खाओ, एकांत को ओढ़ो, एकांत को पहनो और फिर देखो एकांत आनंद. अरे आप तो ये पढ़ कर घबरा ही गए कि आज किस पागल लेखक से पाला पड़ा है जो एकांत को खाने, पीने, ओढ़ने, पहनने की कह रहा है. एकांत भी कोई खाने, पीने और ओढ़ने पहनने की चीज है? आपने ठीक कहा हमारे प्रिय प्रबुद्ध पाठक. एकांत में जीने, खाने, पीने और ओढ़ने का अर्थ है एकांत में ही खो जाओ. उसी में डूब जाओ जिससे किसी पुरुष को आभास न रहे कि कोई कमला, विमला, निर्मला भी है और स्त्री को आभास न रहे कि कोई मोहन, सोहन और त्रिलोचन भी है. मगर एकांत के विपरीत अकेलापान काटता है. आजकल हम अकेलापन अनुभव कर रहे हैं. अकेलापन क्यों अनुभव कर रहे हैं? क्योंकि आजकल हम सिर्फ मैं, मैं, मैं, मैं, मैं, मैं, मैं, मैं, मैं, मैं, मैं, मैं, मैं, मैं, मैं, मैं ही सुनते रहते हैं. अब आप ही बताएं कि जब मैं, मैं, मैं, म...
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जान बची, लाखों पाए (कहानी) भगवान राम अपने प्रिय सखा हनुमान के साथ पृथ्वी पर विचरण कर रहे थे. यह देख कर दोनों खुश थे कि पृथ्वी पर अब उनके कितने मंदिर बन गए है. गली गली और नुक्कड़ नुक्कड़ पर हनुमान जी के मंदिर बन चुके थे. फिर श्री राम तो उनके भी स्वामी थे. स्वामी पीछे कैसे रह सकते थे. कुछ दूर चले होंगे कि उनको लम्बे सफेद चोगे में एक महापुरुष दिखाई पड़े. श्री राम बोले, “मित्र, आप यहाँ कैसे?” “बिल्कुल वैसे ही जैसे आप.” तभी वहाँ दो देवस्वरूप और आ गए. श्री राम और सफेद चोगे वाले ने बाहें फैला कर उनका भी स्वागत किया. हनुमान चारों को एक साथ देख कर और उनको आध्यात्मिक चर्चा करते देख गदगद हो गए. मन ही मन बोले ऐसे स्वर्ण अवसर भला मिलते कहाँ हैं? चारों बतिया रहे थे और हनुमान उस निरंकार की बातों का आनंद ले रहे थे जिसको दोपाये धूर्त प्राणी ने चार भागों विभाजित कर दिया था. हनुमान की खुशी श्री राम की आँखों से छिपी न रह सकी. वे बोले, “हनुमान, इन तीन को भी पहचानते हो क्या?” हनुमान देवस्वरुपों के दर्शन कर इतने भावविभोर हो गए थे कि वे एक शब्द भी नहीं बोल पाए. हां, श्री राम ...
मधुर स्मृतियाँ (कहानी) अचानक शशांक की नजर अपने शयन कक्ष की खिड़की पर जा टिकी थी. खिड़की में से अंदर झांकते हुए उसने जो देखा था, उस पर वह सकपकाया था और फिर मुस्करा दिया था. उसने देखा था कि विमला चैन से सो रही थी. विमला उसकी पत्नि थी. उसने देखा कि वह पसीने से लथपथ है मगर फिर भी गर्मी से एक दम बेखबर है. भयंकर गर्मी के बावजूद वह चैन से सो रही है. यह देख कर शशांक एक बार फिर से मुस्करा दिया था. शशांक फिर से क्यों मुस्कराया था? कहा न कि विमला पसीने से तरबतर थी. फिर भी गहरी नींद में डूब उतर रही थी. दोबारा मुस्कराने का कारण भी वही था. उसके बाद शशांक पुरानी यादों में खो गया था और अपनी उस बेचैनी को भूल गया था जिसने उसे कई घंटों से बेचैन कर रखा था. शशांक को अच्छी तरह से ज्ञात था कि अगर ढ़ोल नगाड़े भी बजते रहें तो भी उसकी प्रिय पत्नि को कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला. शशांक का अपनी प्रिय पत्नि की गहरी नींद से वास्ता पहली रात जिसे लोग मधुमास या सुहागरात कहते हैं, को ही पड़ गया था. जब वह अपने शयन कक्ष में गया तो वह घोड़े बेच कर सो रही थी. यह देख कर उसे बहुत अचरज हुआ था. जिस रात की नवयुग्ल बेसब्री और ...
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